Sunday, May 16, 2010

ममता बनर्जी ने ठीक ही कहा यात्री जिम्मेवार.....

मैं बार-बार कह रहा हूँ की भारत देश की आबादी इतनी अधिक है की इसे संभालना किसी भी सरकार या गैर सरकार संगठन के लिए मुश्किल है। आबादी बढ़ गई पर भारत का आन्तरिक सुभिधाये नहीं बढ़ पाई रेल कर्मचारी क्या करे उसे जीतनी सुभिधाये दी गई है उसे ही वह अपना कर्तब्य समझता है। यात्रियों की संख्या को देखते हुए ट्रेन की बोगिया २०-२२ कर दी गई पर रेल ट्रैक को नहीं बढाया गया ऐसे में यह कहना बड़ा कठिन हो जाता की कौन सी गाड़िया किस प्लेटफोर्म पर आगमन करेगी।
यात्री भी मजबूर है चुकी जनसँख्या के हिसाब से जीतनी गाड़िया होनी चाहिए वो तो है नहीं अगर थोड़ी है भी तो सीट बहुत कम ऐसे यात्री एक-दुसरे पर चढ़ जाना पसंद करता चाहे किसी की जान चली जाये पर वो धक्का-मुक्की कर जाना जरूर पसंद करता।
आये दिन ऐसी घटना होती रहती है की रेल कर्मचारी को निर्धारित या घोषित प्लेटफोर्म को एका-एक बदलना पड़ता है। ऐसे में यात्रियों को भी सजग रहने की आवश्यकता होती पर यात्री एक-दुसरे यात्री का ख्याल कंहाकरने वाले वो तो एक-दुसरे की जान लेने पर तुले होते की आगे हम जाये तो हम जाये...
आप सडको पर भी यही नज़ारा देख सकते है। गाँव की ओर बस जानेवाली को भी आप देख सकते की किस तरह से यात्री एक-दुसरे पर लड़ कर यात्रा करते । लोकल सवारी चाहे वह रेल , बस या ऑटो हो सब में यात्री लादे जाते है। आखिर यात्रियों के पास क्या बिकल्प है? सरकार क्या करेगी? सरकार तो नहीं कहती की आप लादे जाओ फिर भी आप एक-दुसरे पर चढ़ के जाते हो आखिर क्यों?
जनता भी कम दोषी नहीं ? भले ही जाँच के लिए ममता जी ने कह डाला पर जनता को खुद इसकी जांच करनी चाहिए की दोषी सरकार या हम ?????????????????????????

Friday, May 14, 2010

अगर भारत में हिटलर होता .........

भा जा पाके राष्ट्रीय अध्यक्ष ने ऐसा कुछ भी नहीं कहा जिससे किसी को आहत पहुंचे। अगर किसी को आहत पहुंचा हो भी तो वह सही मायेने में भारत का कुत्ता (डॉग) ही होगा। अफ़सोस है की भारत की जनता ७०% गाँव में रहती है, उनके पास गुमराही समाचार के अलावा कोई ऐसा माध्यम नहीं जिससे वे लोग क्रांति ला सके। प्रिंट मीडिया या इलेक्ट्रोनिक मीडिया ये सब शहरो में ही विकसित है। बिहार के कई ऐसे नेता है जो कुत्ते के सामान है वो थाली चाटना जानते है और साथ में बिहार की जनता को थाली चटवाना भी जानगए है। अगर सही में आज हिटलर होते तो सायद बिहार के इन नेताओं को जिन्दा गोली बिच बाज़ार में मार दिया होता।
बिहार के कई ऐसे नेता है जो रहमो-करम पर जिन्दा है। अगर इन नेताओ पर सी बी आई शिकंजा कसे तो ये कंही के न रहे। इनके पास कंही न-कंही से पॉवर यानी जनता को गुमराह कर सत्ता पक्ष में आ जाते और जनता के साथ खून का होली खेलते। मीडिया को विज्ञापन का लालच देकर उनसे अपने पक्ष में लिखवाते है। यही तो इन नेताओ का चरित्र हो गया है।
गडकरी जी ने सही कहा कई ऐसे नेता देश के अंदर है जो कुत्ते के सामान है । अरे जो नेता कुत्ता रहेगा उसे तो लोग कुत्ता ही कहेगा न।
कुत्ते लोग सावधान हो जाओ नहीं तो एक न - एक दिन हिटलर आएगा ही और तुम सभी कुत्तों को जिन्दा सड़क पर जनता को खाने के लिए छोड़ देगा । जनता जब इन कुत्तों से तंग आ जाएगी तो इन कुत्तों को तो खाने का काम ही करेगी न। गडकरी जी आप चिंता न करे देश की जनता आपके साथ है। घर की मुर्गी दाल बराबर बिहार के नेता ऐसे ही है जो सत्तू और चिउरा -मिट्ठा का लालच देकर भीड़ खड़ा कर लेते चुकी इनके पास चारा जैसे कई घोटाले का पैसा जो है। आप मत घबराओ गडकरी । आप मंत्री नहीं बने इसलिए राष्ट्रीय नेता के रूप में इन कुत्तों ने अभी तक नहीं पहचाना है आपको । इन नेताओ ने मंत्री पद से देश की जनता का रुपया लूट लिया है तो ये राष्ट्रीय नेता की भाषा बोलने लग गए। गडकरी आप राष्ट्रीय नेता हो कोई जन्म से नहीं पैदा लेता राष्ट्रीय नेता इन कुत्तों को आप बता दो......

Thursday, May 6, 2010

संसद में अनंत जैसा नेता

लालू और अनंत कुमार का वाक्य युध्ध संसद में देखने और सुनने लायक तो नहीं था किन्तु भारत देश के ५४५ लोग जो भारत की तकदीर लिखते है वो इस तांडव में कुछ हंसते तो कुछ लड़ते दिखे। यह बात भी बिलकुल सही में कहा गया की लालू न तो देश के बारे में सोंचते और न ही बिहार के तर्रक्की । लालू को अगर "देशद्रोह" कहा गया तो इसमे क्या जुल्म हुआ।

लालू के राज्य-पाट में जितना अनियमितता और घोटाले का पर्दाफास हुआ क्या सिध्ध नहीं करता की देशद्रोह वाकई में वो है। लालू जातीय आधार की बात करते है तो वो बताये की कितने यदुबंसी को उंच्या शिक्षा दिलवाया कितने को विधायक और संसद का मार्ग दिखलाया अगर वो दिखलाये भी तो अपने सगे-सम्बन्धी को ही। आम यदुबंशी तो आज भी गाँव में दूध बांटने का काम ही कर रहे है । देश की जनता ने उन्हें संसद में भेजकर बहुत बड़ा गुनाह किया । देश की जनता को उनसे हिसाब-किताब पहले लेना चाहिए और साथ में यह भी पूछना चाहिए की उन्होंने भारत देश के लिए अब तक क्या किया?

संसद में वाकई अनंत कुमार जैसे कद्दावर नेता की आवश्यकता है जो लालू जैसे नेता को खुलेआम "देशद्रोह" कहने का जिगर रखता हो। अनंत कुमार जी आपको कोटिशः बधाई ।

Friday, March 19, 2010

१९७७ के कुत्ते

रामायण युग में भ्रष्ट, अत्याचार और राक्षसों के बिनाश के लिए राम की बानर सेना ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी । हलाकि लोग कहते है आज भी उनके वंशज है पर उदंड, लालची और कोहराम से भरा। वर्तमान युग में १९७७ के कुत्ते का कोहराम पुरे देश के लोग झेल रहे हर कोई के जुबान पर है की नेता, पुलिस, प्रशासन और शासन सब के सब भ्रष्ट हो चुके पर आगे बढ़ने को कोई तैयार नहीं।
जी हाँ आज भारत के अधिकांश राज्यों में १९७७ के ही कुत्तों का राज्य-पाठ है। बिहार को ही देखे सब-के-सब १९७७ के जन्मे है और ये गर्व से कहते भी है की हम १९७७ के उपजे है। गुजरात में भी देखे तो १९७७ के ही। ये सभी कुत्ते कंही न कंही अपनी छाप इन्सान पर छोड़ अपना राजपाट कर रहे। सिर्फ यंही नहीं १९७७ के वंशज भी अब इंसानों पर राजपाट कर रहे। जरूरत है २१ वी सदी के कुत्तों की जो एलास्तिसिटी थेओरी पर आधारित है । इन्हें आप उतना ही खिंच या तान सकते जितना आपको जरूरत है ज्यादा इन्हें खीचने से ये ब्रेक कर जायेंगे। ये अत्याधुनिक है, तकनिकी यन्त्र से लैस जो एक सुरक्षित, कुशल यवम जनता के उम्मीदों से भरा पड़ा होगा।
आइये हम सब १९७७ के कुत्तों से बचे और अपने वोट से इन्हें शिकस्त करे । दलगत राजनीत से उभरे जो अच्छे इन्सान हो उन्हें दलगत भावनाओ से हटकर मतदान करे। आम तौर पर हमने देखा है की जब जनता को इन १९७७ के कुत्तों को उखाड़ फेकना होता है तो जनता फिर उन्ही दलगत भावनाओ में आकर उन्हें वोट करती । जरूरत है पार्टी या दलगत से ऊपर उठने की। अगर आप ऐसा नहीं करेंगे तो तो ये मठाधीश बने रह जायेंगे और २१ वी सदी के लोग ................................

Sunday, March 14, 2010

क्या ३३% महिला विधेयक से सभी वर्ग के महिला को लाभ होगा?

देश पर भारी कुछ खास वर्ग ही है ऐसे में यह तो तय करना ही चाहिए की ३३% आरक्षण में सिर्फ उन्ही वर्ग के महिला संसद में न पहुंचे जो पहले से मजबूत है। सभी पार्टी या दल के चुनाव समिती के सदस्य गन उच्य वर्ग से प्रायः आते है और जब सिम्बोल देने की बात आती है तो वंहा समीक्षा यह होती है की - फलाने की हैसियत नहीं, तो वह दलित है, तो वह अल्पसंख्यक है , तो वो हमारे लोबी के नहीं आदि ऐसे प्रश्न के आधार पर उन्हें सिम्बोल से बंचित कर दिया जाता। मीडिया में भी आप देखे तो एक खास वर्ग के लोग ही शीर्ष पर बैठे है। ऐसे में क्या सही में गाँव , क़स्बा, बस्ती या टोला की महिलाओं को आरक्षण का लाभ मिल पायेगा?
कांग्रेस और भा ज पाअगर सही में चाहती है की ३३% महिला को आरक्षण मिले तो आवाम की आवाज को सुनना चाहिए और ३३% में यह बारा-न्यारा करना होगा की सभी वर्ग यानि सभी जात से महिला प्रतिनिधि करेंगी यह नहीं की सिर्फ ब्रह्मण, भूमिहार, राजपूत के महिला को ही आरक्षण का लाभ मिले। अगर ऐसा आरक्षण का मतलब सिर्फ खास वर्ग के लिए हो तो यह निरर्थक होगा, बेमानी होगी महिलाओं के साथ। कई राज्यों में ५०% महिला आरक्षण से गाँव, कसबे, टोला आदि की महिलाये आगे बढ़ी है।
पंचायती चुनाव में जब महिलाये जीत कर आई थी तो सभी को लगता था की ये क्या हो रहा है पर जब वो अपने कार्य-कुशल की क्षमता को भारतीय पटल पर रखी तो दुनिया अचंभित सी दिखी।
टिकरी मुलायम , शरद यवम लालू की बात को सुनकर ३३% में ही सभी वर्ग के लिए आरक्षित कर देना चाहिए। मेरे समझ से जो अब तक अर्चने है वह यही है की ३३% महिला विधेयक का मतलब यह नहीं की सिर्फ उच्य वर्ग इसका लाभ ले।

Friday, March 12, 2010

आनंद से भरा महिला विधेयक

पुरे देश पर भारी टिकरी (मुलायम, लालू यवम शरद )। आखिर ऐसी कौन सी मज़बूरी हो गई जिससे रूलिंग पार्टी या संसद को महिला विधेयक पास करने में इतना बिलम्ब हो रहा ? ३३% तो सभी वर्ग के लिए है इस बात को बुध्धिजीवी वर्ग इन तिकरियों को समझाने में असमर्थ क्यों है?

भा ज पा में भी अंतर्कलह , राजद भी राग अलाप रही उधर सपा भी चिल्ला रही वन्ही ज द यु में भी दो फार है नितीश कह रहे हम महिला आरक्षण के समर्थन में है तो शरद कह रहे है की हम संसद में प्राण दे देंगे । यह तो नाटकीय जाल है भाई। जनता को तो ये लोग पुर्णतः बेबकूफ ही समझ लिया है। ये लोग जान गए है की हम जो चाहेंगे वही जनता को करना होगा चाहे वो हंसकर करे या रोकर। मीडिया भी इसमें पुरजोर मज़ा ले रही।

Sunday, February 28, 2010

राहुल की शहनाई में संघ यवम भाजपा

एक ओर संघ ने हिन्दुत्व को साइड कर "राष्ट्रवाद और संस्कृतिवाद " का नारा बुलंद किया तो एक टीवी चैनल ने राहुल महाजन के सगाई के लिए १६ लड़कियों को खुलेआम डेटिंग, डांसिंग और न जाने कितने रशमो-रिवाजो को भारतीय सभ्यता के खिलाफ दिखाया। १५ लड़कियों के लिए तो खतरा हो गया की उनसे शादी कौन भारतीय करेंगे जिन्होंने चैनल पर वो सब कुछ देखा जो एक पत्नी के रूप में सार्वजानिक नहीं देख सकते ?
राहुल तो भाजपा के सदस्य भी रहे है और भारतीय राजनीत में कदम भी रख चुके थे । और राहुल उन १६ लड़कियों में किसी एक से शादी करेंगे तो बाकि १५ लड़कियों से कौन शादी करेगा यह तो संघ ही बता पायेगा की वो कैसे संस्कृतिवाद का रक्षा करेंगे।