Tuesday, September 1, 2009
भारत में ट्रिपल "बी" की बीमारी
Friday, August 28, 2009
आज का युवक कृष्ण हो सकता युधिष्ठिर नही
कौन कहता है संघ में ५५-६० का ही उम्र है। आज संघ के प्रमुख ने मीडिया के सामने बयां जो दिया उसमे तनिक भी सच्चाई नही दिखती । के सी सुदर्शन और आज के प्रमुख पहले अपनी उम्र तय करे की उन्हें कब तक काम करना है तभी किसी पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने की चेष्टा करे। संघ राजनीत से अलग रहकर बात कर ही नही सकती क्योंकि उनके मिशन में अर्थ और राजनीत अहम् है बगैर इनदोनों के संघ एक डेगभी आगे नही चल सकती।
संघ भारतीये समाज को बरगला रही है। हिंदुत्वा की रक्षा करे लेकिन समाज में विभाजन न करे। जसवंत की किताब गुजरात में प्रतिबन्ध कर दी गई बिना सोंचे-समझे। सिर्फ़ इसलिए की पटेल समाज की बात थी तो दूसरी ओर अल्पसंख्यक समाज का । गुजरात के वर्तमान मुख्यमंत्री संघ घराने से आते है । संघ प्रमुख ने जसवंत की किताबें नही पढ़ी पर राजनीत जरूर कर रही है। संघ के पास कोई ऐसा युवक नही जो भारतीये संस्कृति और हिंदुत्वा का पाठ भारतीये समाज को पढ़ा सके। आज का युवक कृष्ण हो सकता है युधिष्ठिर नही।
संघ जब तक भाजपा में दखल देती रहेगी तब-तक भाजपा दिल्ली की कुर्सी को हथिया नही सकती। भले ही संघ भाजपा से गैर संघी नेता को पार्टी से निकल-बहार कर ले। आज संघ आडवानी को कह रहा रिटायर तो वह दिन भी दूर नही जब जनता संघ को राजनीत से दूर कर दे। बढती जनसँख्या इस बात को इंगित करती है।
संघ की नीति स्पस्ट है की आगामी चुनाव में हिंदुत्वा का कार्ड पूर्ण रूप से खेले यही वजह है की भाजपा अब दो भागो में बंटेगी। आगे -आगे देखिये संघ का दपोर्संखी जवाब......................................और राजनीत।
Wednesday, August 26, 2009
भारत आज़ाद किंतु गुलामी आज भी पसंद
भाजपा को मुद्दे की लडाई लड़नी चाहिए न की धर्म और मजहब की
भाजपा के शीर्ष नेताओं में गैर संघी ज्यादा रहे है। यही वजह है की भाजपा भी अपने मूल उदेश्यों को छोड़ अब तक भटकती रही है। न तो वह राम का ही नाम ले सकी और न रहीम का। १९५२ से सक्रिए राजनीत में एक ही पार्टी देश पर हाबी रही वह है कांग्रेस । बीच-बीच में कुछ-एक वर्षों के लिए भारतीये जनता ने कांग्रेस से मुंह मोड़ ली थी। वह भी रणनीतिकारों की वजह से वरना कांग्रेस को सत्ता से कोई दूर नही कर सकता था। आज भारतीये राजनीत में विपक्ष के पास कोई रणनीति नही । अब वो जमाना गया की कोई राम और रहीम के नाम पर सत्ता काबिज़ कर ले।
भाजपा को राजनीत करनी है तो संघ से अलग रहे और संघ को अपने मिशन में आगे बढ़ना हो तो वे राजनीत से कोसो दूर रहे।
Sunday, July 26, 2009
आयोग महिलाओं के प्रति उदासीन
महिला आयोग की अध्यक्ष महोदया महिलाओं के प्रति उदासीन ही अब तक दिखी है। चुकी अब तक न तो वो भारतीये महिलाओं को भारतीये सभ्यता का पाठ पढ़ा पाई है और न तो उनके प्रति जागरूक ।
मैं व्यक्तिगत तौर पर उनसे यह पूछना चाहता हूँ की वो इस पद पर अस्थापित होने के लिए कितने सीढियों को पार की है। उनकी योगता यानि शैक्षणिक योग्य क्या रही है? क्या वो आ इ एस रही है या राजनैतिक योग्यता के बल पर महिला आयोग की अध्यक्ष बनी है? मेरे समझ से यह पद राजनैतिक पद है और ६ साल के लिए नियुक्त किए जाते है। श्रीमती व्यास यह बतलाये की उन्होंने अब तक महिलाओं के लिए क्या किया है?
आज बिहार में किसी महिला के साथ किसी युवक ने शर्मनाक तरीके से पेश आकर मीडिया में बात आई तो व्यास जी ने त्वरित टाईम्स ऑफ़ इंडिया में यह बयां दे डाली की _ "शे वास शोक्केड़ तो शे टीवी फुटेज ऑफ़ थे इंसिडेंट अद्दिंग नोट ओनली इट्स पेर्पेत्रतोर्स बुत अल्सो थे स्पेक्टातोर्स ओउघ्त तो बे पुनिशेद" । मैं उनसे पूछता हूँ की उन्होंने भी तो यह दृश टीवी पर देखा ।
मैं व्यास जी से कहना चाहता की जब समाज के अंदर ही दूरितियाँ पैदा हो गई है तो सरकार या आम आवाम क्या करेगी। आज समाज के अंदर महिलाएं जिस तरह का पोशाक पहन कर सड़कों पर आ रही है उससे लगता है महिलाये ख़ुद पुरुष वर्ग को न्योता दे रही है की आओ मेरे पास । बाद में यही महिला भारतीये कानून का मज़ाक बनाकर पुरुष वर्ग को कारागार तक पहुचाने में सफल हो जाती । वाह क्या बात है महिलाओं का और महिला आयोग का।
Sunday, May 10, 2009
जोड़ - तोड़ की राजनीत में प्रणव मुख़र्जी प्रधानमंत्री
Friday, May 8, 2009
फर्नांडिस साहब लोक सभा ०९ का चुनाव जीतते-जीतते हारे
फ़र्नान्डिस साहब लोक सभा चुनाव मुजफ्फरपुर से हार रहे है यह लिखना बिल्कुल ही ग़लत है । पर आप सभी को चुनाव परिणाम पूर्व बताना भी मेरा धर्म है क्योंकि मैं अभी बिहार भ्रमण कर दिल्ली लौटा हूँ।
फर्नांडिस साहब भारत ही नही अपितु सम्पूर्ण विश्व में अपनी पहचान को बनाये रखने में उनकी योग्यता, , हठता , कर्मण्यता, दूरदर्शिता, पारदर्शिता आदि शामिल रही है। फर्नांडिस साहब चुनाव जीतते-जीतते हार गए। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ की इनके चुनाव का कमान कुछ असामाजिक तत्वों के साथ जुड़ी हुई थी। इनके सिपह-सलाहकार कुछ ऐसे थे जो पैसा कमाने में लगे थे इन्हे मुजफ्फरपुर लोक सभा का परिसीमन तक मालूम नही था। कार्यकर्ता में उत्साह, उमंग जरूर देखने को मिला पर पर चुनावी योजना को सकारात्मक रूप देने में ये लोग सफल नही हो सके।
फर्नांडिस साहब के विरूध्ह कैप जय नारायण निषाद, विनीता विजय, भगवान लाल सहनी ही मैंदान में थे और इन्सबो में इनकी उम्मीदवारी एक दमदार के रूप में थी, किंतु इनके एजेंट लोग सिर्फ़ पैसा को अपने-अपने हितों में बटोरने में लगे रहे। चुनाव के एक दिन पूर्व ही फर्नांडिस साहब अपना प्रेस कांफ्रेस कर दिल्ली लौट आए।
चुनाव कमान को संभालने वालों में से गाँधी संसथान के सुरेन्द्र ओझा, शिव कुमार यवम प्रवीन जाडेजा आदि शामिल थे।