आतंकवाद सुनते-सुनते लोग थक चुके हैं। अब लोगो के दील-दीमागपर आतंकवाद मानो एक अन्कुरेब्ल बीमारी सा बन गया है जिसका इलाज न तो सरकार के पास है, न तो जनता के पास और न ही शिक्षक के पास। अगर इसका इलाज कुछ है तो वह है "प्रलय" ।
मैं जब छोटा था तो अपने घर में ज्यादा शरारत किया करता था मेरे शरारत से घर के लोग अक्सर कह दिया करते थे की तुम बहुत आतंक मचा रखे हो। पहले के ज़माने में आतंक से मतलब था दूसरों को कष्ट देना। आज इस विश्वीकरण के दौड़ में आतंकवाद का मतलब है "आजादी" ।
आजादी के लिए आतंक की जरुरत नही होती बल्कि युद्ध करना होता है। और युद्ध के लिए व्यापक स्तरपर एक ठोस नीति, युद्ध सामग्री व सैनिक की आवस्यकता होती है जो इन आतंकवादियों के पास नही होती। ये आज भी वही काम कर रहे हैं जो बचपन में अपने घर और मुहल्लों में किया करते थे। इन आतंकवादियों का मकसद मेरे समझ से दुसरे को कष्ट पहुचना मात्र है । अगर इन आतंकवादियों में दम होता या इनके मां ने बचपन में दूध पिलाया होता तो ये आम लोगों को कष्ट नही पहुचाते। ये आतंवादी सही में हिजरे हैं जो चुके से कहीं पर बम बिस्फोट कराकर आम जनजीवन को तबाह कर रहे है और नेता के आगोश में फल-फूल रहे हैं।
इस आतंकवाद का सामना हिंदुस्तान का एक-एक आदमी, एक-एक बच्चा, एक-एक महिलाएं खुलकर बिरोध करें तो इन हिजरे आतंकवादियों का खत्म तय है। अगर हम-आप सरकार के स्तर से खत्म की बात करेंगें तो सायद कभी भी ख़त्म नही होगा अगर होगा तो वह केवल "प्रलय" से.